भगवद्गीता
गुरुवार, 9 नवंबर 2017
राज़सिक बुद्धि
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले
,
हे पार्थ (अर्जुन)
,
कि जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को
,
करने योग्य कार्य और न करने योग्य कार्य को गलत ढंग से समझता है
,
वह बुद्धि राजसिक होती है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें