भगवद्गीता
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
राजसिक सुख
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो सुख इंद्रियों के अपने विषय के साथ सन्योग करने से सृजित होते हैं
,
जो कि प्रारंभ में अमृत के समान प्रतीत होते हैं परंतु अंत में विष के समान प्रतीत होते हैं
,
ऐसे हुखों को राजसिक सुख कहा जाता है ।
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