गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण आत्मज्ञान के लिये आहर्ता बताते हुये कहते हैं कि जो पुरुष
द्वैतों यथा सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, शीत-ताप आदि से प्रभावित नहीं होता है
और प्रकृति के कर्मों को बिना फल की कामना किये करता है वह आत्मज्ञान के लिये
योग्य पात्र बन जाता है । जिसका जन्म हुआ है उस प्रत्येक की मृत्यु तो होगी ।
आत्मज्ञान मृत्यु से परे का ज्ञान है जिसपर मृत्यु का प्रभाव नहीं होता है । यह
जीवन के मानको को मृत्यु से ऊपर उठाने की स्थिति है । मनुष्य यदि सांसारिक
परिवर्तनों से प्रभावित होता है, मृत्यु-दु:ख उसे अपने कर्म से विचलित
करते हैं तो निश्चित ही वह अज्ञान की परिधि में है ।
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