शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 6

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण आत्मज्ञान के लिये आहर्ता बताते हुये कहते हैं कि जो पुरुष द्वैतों यथा सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, शीत-ताप आदि से प्रभावित नहीं होता है और प्रकृति के कर्मों को बिना फल की कामना किये करता है वह आत्मज्ञान के लिये योग्य पात्र बन जाता है । जिसका जन्म हुआ है उस प्रत्येक की मृत्यु तो होगी । आत्मज्ञान मृत्यु से परे का ज्ञान है जिसपर मृत्यु का प्रभाव नहीं होता है । यह जीवन के मानको को मृत्यु से ऊपर उठाने की स्थिति है । मनुष्य यदि सांसारिक परिवर्तनों से प्रभावित होता है, मृत्यु-दु:ख उसे अपने कर्म से विचलित करते हैं तो निश्चित ही वह अज्ञान की परिधि में है ।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें