मुक्त
आत्मा का निवास ब्रम्ह में होता है । आत्मा जब तक ब्रम्ह के धर्म के अनुकूल आचरण
करती है तब तक वह ब्रम्ह स्वरूप ही होती है । इस स्वरूप में वह रूप धारण से पूर्व
से अनंत पर्यंत काल तक रहती है । जब तक इस रूप संसार का विलय नहीं होता है तब तक
बहुसंख्यक आत्माये अपने रूप के गुण के अनुरूप इसमें रहती हैं । बहुसंख्यक आत्माओं
को इस रूप संसार से अलग नहीं किया जा सकता है । मुक्त आत्माये सत्य को जानते हुये
मोंह से निर्लिप्त रहती हैं जबकि आसक्त आत्माये जन्म और मृत्यु को भोग करते बंधनकारी
कर्मों को करते लिप्त दशा में रहती हैं ।
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