हम
अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह को विस्मृत कर प्रकृतीय मोंह में आसक्त हैं । ब्रम्ह का
मौलिक स्वरूप निर्लिप्त, निरंकार होता है । प्रकृति से
अप्रभावित । परंतु अज्ञानवश जब हमारी आत्मा मोंह में आसक्त हो प्रकृति की दास बन
बैठती है तो हमारा पुनीत कर्तव्य बन जाता है कि हम अपनी आत्मा को प्रकृतीय मोंह से
मुक्त करावें । गीता में यही मुक्ति का पथ निर्दिष्ट किया गया है । आत्मा को अपने
मौलिक स्वरूप में पुनर्स्थापित करने का पथ ।
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