अर्जुन
जब मोंह के वशीभूत अपने निर्धारित कर्म से विमुख होने को उद्यत होता है तो स्वयं
उसके ही अंत:करण में विद्यमान सद्विचारों की छवि उससे प्रश्न करती है । यह प्रश्न
उसे विदित तब हुये जब वह विषेस प्रयत्नों द्वारा मोंह को काटने में समर्थ हुआ ।
अंत:करण के धरातल में परम् सत्य विद्यमान रहता है । अर्जुन के अंत:करण के धरातल
में श्रीकृष्ण हैं । मनुष्य और परम् सत्य में कोई दूरी नहीं है । परम् सत्य और
मनुष्य के मिलन के लिये किसी अन्य माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है । केवल
जिज्ञासु हृदय और सत्य निष्ठा की आवश्यकता होती है । मनुष्य अर्जुन और उसी के अंत:करण
में उपस्थित श्रीकृष्ण के मध्य सतत् प्रश्न उत्तर तब तक होते हैं जब तक पूर्ण
मानसिक सामंजस्य स्थापित नहीं हो जाता है । परम् सत्य कोई हमसे दूर का अस्तित्व
नहीं है अपितु हमारे अंदर हमारे हितैषी के रूप में हमारे मित्र के समान विद्यमान
है और हर पल हमारे साथ है ।
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