प्रकृतीय संसर्ग में रहते हुये प्रकृतीय मोंह मे आसक्त व्यक्ति स्वप्न में भी
आत्मज्ञान और परम् सत्य की अनुभूति में निहित सुख की कल्पना नहीं कर सकता है । इसलिये
अज्ञात लक्ष्य को पाने के लिये प्रयत्नशील होने के लिये उसे उपलब्ध प्रकृतीय मोंह
का त्याग अत्यंत भयकारक प्रतीत होता है । इस स्थिति को गीता के ग्रंथकार ने अर्जुन
के मोंह के माध्यम से व्यक्त किया है ।
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