गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

अर्जुन का विषाद बढा

गुरू के उपदेश को सुनते ही मानों अर्जुन का विषाद और उमड पडा । कहने लगा कि सामने गुरू हैं भीष्म,-पितामह हैं सदैव मैंने उनके चरण छूए हैं उनका आशिर्वाद लिया है मैं उनकी हत्या कैसे करूं । यद्यपि कि यह अपने लाभ के विचार से ही युद्ध के लिये उपस्थित हुये हैं परंतु इसके उपरांत भी मेरा विवेक इनकी हत्या के लिये तत्पर नहीं हो रहा है । हे माधव मैं पूर्णतया हत्प्रद दशा में हो गया हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ कि मुझे क्या करना चाहिये । कृपया मुझे उचित मार्ग बतावे । इतना कहकर अर्जुन बिना गुरू के उत्तर की प्रतीक्षा किये कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा । ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे अर्जुन का असमंजस्य निर्णय में पर्णित हो गया । ऐसा कहकर अर्जुन शांत चुप हो गया ।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें