गुरू
के उपदेश को सुनते ही मानों अर्जुन का विषाद और उमड पडा । कहने लगा कि सामने गुरू
हैं भीष्म,-पितामह हैं सदैव मैंने उनके चरण छूए हैं उनका आशिर्वाद लिया है
मैं उनकी हत्या कैसे करूं । यद्यपि कि यह अपने लाभ के विचार से ही युद्ध के लिये
उपस्थित हुये हैं परंतु इसके उपरांत भी मेरा विवेक इनकी हत्या के लिये तत्पर नहीं
हो रहा है । हे माधव मैं पूर्णतया हत्प्रद दशा में हो गया हूँ और समझ नहीं पा रहा
हूँ कि मुझे क्या करना चाहिये । कृपया मुझे उचित मार्ग बतावे । इतना कहकर अर्जुन
बिना गुरू के उत्तर की प्रतीक्षा किये कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा । ऐसा
प्रतीत हुआ कि जैसे अर्जुन का असमंजस्य निर्णय में पर्णित हो गया । ऐसा कहकर
अर्जुन शांत चुप हो गया ।
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