मैं
युद्ध नहीं करूँगा कहकर अर्जुन चुप हो गया । समीक्षाकार कहता है कि मौन व्यक्ति ही
तो गुरू के उपदेश सुनेगा । अर्जुन के मौन पर गुरू श्रीकृष्ण मुस्कराये । समीक्षाकार
इस मुस्कराने का रहस्य बताता है कि श्रीकृष्ण रक्षक ब्रम्ह स्वरूप में सभी मनुष्य
के पाप कृतों एवं मन:संताप से भिज्ञ थे । अर्जुन ने अपने कर्तव्य से बिमुख होने का
मंतव्य प्रगट कर पाप किया था और मुख से अपने पाप कृत के उद्देष्य को कारणयुक्त
बताकर आवरण से ढक रहा था ।
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