शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

उपदेश चरण 2

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि हे अर्जुन तुम उन विषयों के लिये शोक कर रहे हो जिसके लिये तुम्हे शोक नहीं करना चाहिये । ज्ञानी पुरुष ना ही उनके लिये शोक करते हैं जो जीवित हैं और ना ही उनके लिये जो मृतक हो चुके हैं । व्याख्याकार उपरोक्त कथन की व्याख्या करता है कि हत्या, मृत्यु इसी प्रकार आक्रमण और हठात् नगर का कब्जा इन सभी कृतों को किसी नाटक के दृष्य के रूप में ग्रहण करो । बदलते हुये दृष्य और उठती हुई कराह को नाटक का अंग मानो । जीवन के बदलते हुये दायित्वों में मनुष्य की आत्मा नहीं भाग लेती है मात्र पार्थिव शरीर इस संसार के रंग मंच पर दायित्वो के अनुरूप आचरण करता है ।  

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