गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण बताये कि सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, शीत-ताप यह सभी प्रकृतीय संसर्ग के फल
होते हैं । परिवर्तित होते संसर्ग द्वारा यह सभी बदलते रहते हैं । आत्मा का अहंकार
इन सभी की अनभूति कराता है । मुक्त स्वतंत्र आत्मा इन द्वैत अनुभूतियों को स्पर्ष
तक नहीं करती है । मुक्त आत्मा जो भी स्थिति सम्मुख होती है उसे सहर्ष स्वीकार
करती है ।
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