कुछ
विद्वानों का मत है कि दर्शन अपरिवर्तनीय सत्य के लोक के ज्ञान के लिये प्रयोज्य
है जबकि वास्तविक जीवन परिवर्तनशील संसार की घटनाओं से प्रभावित होता है । विद्वान
मार्क्स का मत है कि दर्शन संसार की व्याख्या करता है जबकि वास्तविक कार्य संसार
को सुधारना होता है । परंतु इस मत में व्यक्त दर्शन की संकीर्णता गीता पर प्रभावी
नही है क्योंकि गीता परम् सत्य को जानने हेतु दार्शनिक व्याख्या ब्रम्हविद्या तथा
संसार में जीवन जीते हुये मनुष्य जीवन के लिये उच्चतम आदर्श लक्ष्य को पाने के
लिये पथ योगशास्त्र के द्वारा बताती है । गीता का मत है कि यह संसार मात्र दृष्य
सम्भावना नहीं है अपितु कर्म का युद्धक्षेत्र है । संसार की
प्रगति के लिये मनुष्य की रचनागत प्रकृति को सुधारने की आवश्यकता है ।
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