गीता
में वर्णित युद्ध हर प्रत्येक उस उनुष्य के हृदय में होने वाला युद्ध है जो देवत्व
के उच्चस्तरीय जीवन को पाने को उद्यत होता है । यह युद्ध मनुष्य को अपने ही अंदर
विद्यमान दुर्वृत्तियों का शमन करने के लिये लडना पडता है । यह युद्ध अपनी ही
आत्मा को प्रकृति की दासिता से मुक्त कराने के लिये लडना होता है । मोंहपर विजय
पानेकी दशा में मुक्त आत्मा आनंद की स्थिति का भोग करती है ।
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