भगवद्गीता
का प्रथम अध्याय अर्जुन की आत्म-ग्लानि और मन:संताप के वृतांत के साथ समाप्त होता
है । इसे भी योग कहा गया है क्योंकि ब्रम्ह को जानने की जिज्ञासा आत्म-ग्लानि के
अंधकार में ही पैदा होती है । आत्म-ग्लानि का काला अंधकार ही ज्ञान के प्रकाश की
ज्योति के दर्शन को लोलुप होता है । जीवन की प्रबलतम विकट स्थिति में जब मनुष्य का
सामर्थ्य असहाय महसूस करता है तभी वह अज्ञात शक्ति की सहायता के लिये अधीर होता है
। ऐसे में मनुष्य एकाकीपन, संदेह और अ-सुरक्षा की अनुभूति करता है
। किसी भी मनुष्य को यदि कार्य करना है तो उसमें व्याप्त एकाकीपन,
संदेह और अ-सुरक्षा का निवारण अनिवार्य है ।
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