कर्मयोग
कर्तव्य के कर्मों को, फल की कामना से रहित होकर,
करने की अनुशंसा करता
है । मोंह कर्मफल पहले ही ढूढता है । अर्जुन कहता है कि युद्ध से अमुक अमुक
त्रासदा सृजित होगी अर्थात् कर्मफल पहले ही घोषित करता है । यह पूर्णरूप से
कर्मयोग के विपरीत आचरण हुआ । यह मोंह का फल है । युद्ध त्रासदा के संग मर्यादा की
स्थापना भी है । हम युद्ध द्वारा अपने अंदर व्याप्त मोंह का नाश करके मर्यादित
आत्मज्ञान का जीवन पाते हैं ।
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