रविवार, 8 फ़रवरी 2015

मोंह का फल

कर्मयोग कर्तव्य के कर्मों को, फल की कामना से रहित होकर, करने की अनुशंसा करता है । मोंह कर्मफल पहले ही ढूढता है । अर्जुन कहता है कि युद्ध से अमुक अमुक त्रासदा सृजित होगी अर्थात् कर्मफल पहले ही घोषित करता है । यह पूर्णरूप से कर्मयोग के विपरीत आचरण हुआ । यह मोंह का फल है । युद्ध त्रासदा के संग मर्यादा की स्थापना भी है । हम युद्ध द्वारा अपने अंदर व्याप्त मोंह का नाश करके मर्यादित आत्मज्ञान का जीवन पाते हैं । 

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