प्रत्येक
मनुष्य के अंत:करण में ब्रम्ह का अंश विद्यमान है । परंतु उसे विस्मृत कर हर
प्रत्येक प्रकृतीय मोंह में बँधा है । जब भी इस प्रकृतीय मोंह को त्याग देवत्व के
उच्च स्तर पर जीवन को उठाने की बात आती है तो प्रकृतीय मोंह उस मनुष्य की मन:स्थिति
को उसी प्रकार अकर्मण्यता का असमंजस्य उत्पन्न करती है जैसा कि अर्जुन के माध्यम
द्वारा गीता में व्यक्त किया गया है ।
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