रविवार, 8 मार्च 2015

उपदेश चरण 15

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर की रचना में प्रयुक्त दो अवयव आत्मा जो कि अविनाशी है और प्रकृति जो कि विनाशशील है को बताकर यह परामर्श दिये कि विनाशशील के लिये मोंह मत करो और अपना कर्तव्य समझ कर युद्ध करो । पुन: गुरू को लगा कि शायद अर्जुन संतुष्ट नहीं हुआ है तब उन्होने उसे उसके कर्मदायित्व का संदर्भ देकर उसे सत्य की प्राप्ति के लिये नीयत किये गये युद्ध को अपना कर्म दायित्व मानकर युद्ध में संलग्न होने का उपदेश किये । 

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