ज्ञानी
संत का तीसरा लक्षण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो
हर्ष में हर्षित नहीं होता है और शोक में दु:खी नहीं होता है जिस प्रकार फूल खिलते
हैं और कालांतर से मुरझा जाते हैं । फूल को ना ही खिलने का हर्ष होता है और ना ही
मुरझाने का शोक होता है । ज्ञानी संत के सम्मुख जो भी स्थिति जिस भी रूप में आती
है वह उसे उसी रूप में बिना किसी प्रतिक्रिया के ग्रहण करता है । उसका विवेक दृढता
से आत्मज्ञान में स्थिर रहता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें