शनिवार, 7 मार्च 2015

उपदेश चरण 14

गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि कोई अपने को एक अद्भुद व्यक्ति के रूप में देखता है, कोई अपने को एक अद्भुद व्यक्ति के रूप में व्यक्त करता है, और कोई अपने को एक अद्भुद व्यक्ति के रूप में सुनता है परंतु फिरभी कोई अपने अद्भुद रूप को जानता नहीं है । व्याख्याकार इस कथन की व्याख्या करते हुये बताता है कि हमारे अंदर आत्मा अद्भुद है जिसे कि जानने की बहुसँख्यक लोग आवश्यकता ही नहीं समझते हैं, जो जानना चाहते भी हैं उनमें से अधिक लोग कोई समस्या आने पर जानने का प्रयत्न छोड देते हैं बहुत विरले ही लोग उसे जानने की मंजिल तक पहुँचते हैं । 

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