शुक्रवार, 13 मार्च 2015

योग

भागवद्गीता में गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण मस्तिष्क के नियंत्रण को योग बताते हैं । एक व्यक्ति जिसे साँख्य की स्थिति प्राप्त है, जिसके विवेक में आत्मा और प्रकृति निर्मित शरीर के बीच स्पष्ट भेद विद्यमान है, जिसकी आत्मा संसार के परिवर्तनों से अविचलित रहती है, उस व्यक्ति का मस्तिष्क विवेक के पूर्ण नियंत्रण में जो भी कार्य करेगा वह योग है । मस्तिष्क का साँख्य की स्थिति के विवेक के पूर्ण नियंत्रण द्वारा कार्य बुद्धियोग है । विवेक मात्र धारणा स्थिर करने हेतु नहीं अपितु विवेक जो प्रतिपल परम् सत्य व प्रकृति के मध्य भेद अपने में स्थिर रख सके, यह उस विवेक का सतत् अभ्यास हो, और मस्तिष्क जो इंद्रीय वासनाओं में लिप्त ना रहे अपितु विवेक के प्रति निष्ठावन रहे । ऐसा विवेक और ऐसा मस्तिष्क सृजित करेगा बुद्धियोग । 

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