यदि
जीवन को एक रथ कहा जाय तो विवेक इसका सारथी होता है । इंद्रियाँ रथ के पाँच घोडे
हैं,
और मस्तिष्क उन घोडों की लगाम की रस्सी है । विवेक मस्तिष्क के माध्यम से सभी
इंद्रियों के कार्य को नियंत्रित करता है और साथ ही मस्तिष्क को आत्मज्ञान
आत्मसात् करने का पथ प्रशस्थ करता है । विवेक को परम् सत्य की अनुभूति प्रतिपल
विदित रहने की दशा में जीवन परम् सत्य की ज्योति से प्रकाशित रहता है । यह स्थिति
इस रूप संसार के सृजन के मनतव्य के अनुरूप होती है । विवेक आत्मज्ञान से प्रतिपल
प्रकाशित रहे इसके लिये आवश्यक होता है कि विवेक को आच्छादित करने वाली बाधाओं से
रक्षित किया जाय । ऐसी दशा सृजित करने पर अहंकार का परम् सत्य में स्वयं विलय हो
जावेगा ।
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