मंगलवार, 3 मार्च 2015

उपदेश चरण 10

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह आत्मा अजन्मा है, अपरिवर्तनशील है, इसे कोई किसी भाँति क्षति नहीं पहुँचा सकता है । जिस प्रकार कोई पुराने वस्त्र का त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार यह आत्मा जीर्ण शरीर का त्यागकर नयी शरीर धारण करता है । व्याख्याकार स्पष्ट करते हुये कहता है कि पुनर्जन्म प्रकृति का नियम है । परम् ब्रम्ह गति नहीं करता है । आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में अंतरित होती है । शरीर धारण ,करने पर आत्मा शरीर, मस्तिष्क, प्राण को अपनी ओर आकर्षित करती है जो कि प्रकृति के पदर्थों से बने होते हैं । विज्ञानी आत्मा शरीर (अन्न), मस्तिष्क (विवेक), और प्राण (जीवन) को कार्य सम्पादन क्षमता प्रदान करती है । शरीर धारण करना आत्मा के लिये अनिवार्य वाँक्षना है । 

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