गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह आत्मा अजन्मा है, अपरिवर्तनशील है,
इसे कोई किसी भाँति
क्षति नहीं पहुँचा सकता है । जिस प्रकार कोई पुराने वस्त्र का त्यागकर नये वस्त्र
धारण करता है उसी प्रकार यह आत्मा जीर्ण शरीर का त्यागकर नयी शरीर धारण करता है ।
व्याख्याकार स्पष्ट करते हुये कहता है कि पुनर्जन्म प्रकृति का नियम है । परम्
ब्रम्ह गति नहीं करता है । आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में अंतरित होती है । शरीर
धारण ,करने
पर आत्मा शरीर, मस्तिष्क, प्राण को अपनी ओर आकर्षित करती है जो
कि प्रकृति के पदर्थों से बने होते हैं । विज्ञानी आत्मा शरीर (अन्न),
मस्तिष्क (विवेक), और प्राण (जीवन) को कार्य सम्पादन क्षमता प्रदान करती है ।
शरीर धारण करना आत्मा के लिये अनिवार्य वाँक्षना है ।
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