ज्ञानी
संत का चौथा लक्षण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह
अपनी इंद्रियों की वासनाओं को समेट कर लुप्त कर लेता है । इस कथन को अधिक स्पष्ट
करने हेतु कछुवे का उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार कछुआ अपनी गर्दन को अपनी कूबड
में समेट लेता है । ज्ञानी संत विवेक को विचलित करने वाली समस्त बाधाओं से अपने को
पूर्ण रक्षित कर अपने विवेक को आत्मज्ञान में केंद्रित रखता है ।
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