गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कार्य में संलग्न होने के लिये उपयुक्त मानसिकता
बताते हैं । मस्तिष्क को समभाव में रखते हुये युद्ध को लडो । मस्तिष्क में किसी
परिवर्तन की अभिलाषा ना हो, भावुकता के प्रभाव से उचित अनुचित का
द्वंद ना हो, प्रकृति ने जो दायित्व जिस रूप में दिया है उसे उसी स्वरूप
में ग्रहण करो । उपरोक्त वर्णित मस्तिष्क की स्थिति पाने का रहस्य बताते हुये गुरू
ने बताया कि जब व्यक्ति अपने आत्मा के शाश्वत् सत्य का अनुभव कर लेता है और वह उस
सत्य के प्रति निष्ठावान बन जाता है तो फिर सांसारिक परिस्थितियाँ उसके मस्तिष्क
को प्रभावित नहीं कर पाती हैं ।
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