गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को साँख्य व योग बताने के उपरांत कहा कि मनुष्य
द्वारा अपनी आत्मा को परम् सत्य के प्रति समर्पित करने में जीवन के पूर्णता की
स्थिति को प्राप्त होता है । प्रकृति की असँख्य सम्भावनाओं की ओर प्रवृत्त होना
मनुष्य के लिये स्वाभाविक क्रम होता है । परंतु इन असँख्य सम्भावनाओं की ओर उन्मुख
होने पर मनुष्य कभी इनसे मुक्ति नहीं पा सकता है । इसलिये एकाग्र होकर अपने
कर्तव्य दायित्व के प्रति अपने को केंद्रित करो । ऐसा करने के लिये अपनी आत्मा का
अनुभव करो । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य की अनुभूति करते हुये एकाग्र बुद्धि
द्वारा किये गये कर्म सर्वोत्तम होते हैं ।
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