ज्ञानी
संत का दूसरा लक्षण बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण कहे कि जो विषमतम
स्थितियों में भी विचलित नहीं होता है, हर्ष के उत्कर्ष वातावरण में भी किसी
इच्छा की जिज्ञासा नहीं करता है, जिसको उत्तेजना,
भय,
द्वेष व क्रोध का लेशमात्र भी असर नहीं होता है वह संत अपने विवेक के केंद्रित
अवस्था में परम् सत्य में लीन रहता है ।
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