धर्मदर्शन
के छ: मान्यता प्राप्त मार्गो में से साँख्य एक है । परंतु भागवद्गीता में गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को साँख्य बताते हुये कहे कि पुरुष (आत्मा) तथा प्रकृति
(मैं-नही) (सत्य-नहीं) के बीच स्पष्ट द्वैत का भेद साँख्य है । परम् सत्य आत्मा और
प्रकृति दोनो का स्वामी है । विवेक द्वारा परम् सत्य का अनुभव साँख्य है । यह परम्
सत्य और विवेक का एकीकरण है । परम् सत्य का बोध परस्पर चर्चा अथवा अध्ययन की
प्रक्रिया में परिचर्चा द्वारा नहीं अपितु स्वयँ अपने अनुभव द्वारा । गीता की
मान्यता है कि यह बोध इच्छाओं के शमन द्वारा सम्भव होता है ।
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