भगवद्गीता
सोमवार, 14 दिसंबर 2015
विस्तार चरण 3
व्यापक ब्रम्ह के विस्तार को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे हे पार्थ मैं सभी जीवों की उत्पत्ति का सदैव रहने वाला कभी नष्ट न होने वाला वीर्य हूँ
,
मैं बुद्धिमानों की बुद्धिमत्ता हूँ
,
मैं प्रत्येक सुंदर स्वरूप की सुंदरता हूँ ।
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