बुधवार, 23 दिसंबर 2015

भ्रम का निमित्त

माया जो कि मनुष्य के मस्तिष्क में व्याप्त समस्त मोंह और भ्रम की जननी होती है को गुरू ने अजेय बताया है । ब्रम्ह स्वयं इन गुणों का रचयिता है । मनुष्य ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति की रचना है जो कि ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति के सहारे पर स्थिर है में कंचिद यह क्षमता नहीं है कि वह ब्रम्ह द्वारा निर्मित माया की शक्ति का अतिक्रमण कर सके । इसका अतिक्रमण ब्रम्ह की कृपा द्वारा ही सम्भव है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें