आठ वर्गीय निम्नतर प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर में उच्चतर
प्रकृति आत्मा स्थापित है । यह आत्मा शरीर की इंद्रियों, मस्तिष्क, विवेक का प्रयोग करता है जिससे
अहंकार का जन्म होता है । यह अहंकार शरीर के अंगों का प्रयोग अपनी इच्छाओं की
पूर्ति मे करता है । प्रत्येक रूप एक क्षेत्र है जिसका कि आत्मा क्षेत्रज्ञ है ।
क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र की परस्पर क्रिया द्वारा कर्म की उत्पत्ति होती है
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