गुरू द्वारा बतायी गई सत्य की प्रकृति ही इस रूप संसार की रचना
का आधार होती है । सत्य की अव्यक्त प्रकृति के यह आठ अंग जब रूप धारण करते है तो
यह रूप संसार प्रगट होता है । परंतु यह रूप संसार मात्र सत्य की प्रकृति का प्रगट
रूप है । यह सत्य अस्तित्व नहीं है । सत्य की प्रकृति और अधिक व्यापक है ।
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