कोई भी व्यक्ति जबभी कोई प्रार्थना करता है, इससे सर्वप्रथम उसकी ईश्वर के प्रति आस्था
विदित होती है । इस आस्था के सहारे वह व्यक्ति अपने अंदर उपस्थित अभिमान, लालच, भय और इच्छाओं को जानने में सफल होता है । शनै: शनै: उसे ऐसा
अहसास होता है कि कंचिद उसे ईश्वर से ऐसी भौतिक वस्तुओं को नहीं माँगना चाहिये ।
पुन: अनुभव बढने पर वह ईश्वर से ज्ञान माँगने लगता है । परंतु यह प्रार्थना द्वारा
मांगने की समस्त प्रक्रिया मूल रूप से ईश्वर को अपनी इच्छाओं की पूर्ति का श्रोत
के रूप में प्रयोग करने का भाव प्रगट करती है । जबकि एक संत ईश्वर की सेवा अपने
आराध्य की सेवा के भाव से करता है और अपने को ईश्वर के सम्मुख एक सेवक के रूप में
प्रस्तुत करके विनय करता है कि हे ईश्वर मेरी सेवा आपको जैसे अनुकूल हो ग्रहण करें
। यही सर्वोत्तम स्वरूप है और भाव है ।
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