गुरू ने ब्रम्ह की शरण न ग्रहण करने वाले व्यक्तियों का वृतांत
बताया । ऐसे व्यक्तियों को प्रयत्नपूर्वक सद्वृत्ति में प्रवृत्त होने के लिये रज़स
और तमस का त्याग करना चाहिये । पुन: उन्हे सद्वृत्ति को भी त्यागना ही होगा
क्योंकि सद्वृत्ति भी बंधनकारी ही होता है । परंतु प्रारम्भिक अवस्था में उन्हे
रज़स और तमस से मुक्ति पाने के लिये सात्विक को पाना ही लक्ष्य करना होगा ।
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