इस श्लोक में गुरू ने इच्छा
पूर्ति की कामना – काम, जो प्राप्त हो चुका है उसकी सुरक्षा – राग दो अलग शब्दों द्वारा व्यक्त किया
है । श्लोक के उत्तरार्ध में गुरू ने कहा कि जीवों में पायी जाने वाली सत्य को
जानने की कामना मैं हूँ । बिना इच्छा के तो कुछ पाया नहीं जा सकता है । व्यक्तिगत
इच्छा को वर्जित बताया गया है । इसके विपरीत सत्यको जानने की इच्छा के लिये ब्रम्ह
कहे कि मैं स्वयं हूँ ।
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