ब्रम्ह की अविनाशी प्रकृति के
विद्यमान होने पर ही रूप अपनी प्रकृति ग्रहण करता है, स्वरूप में स्थिर होता है । फिरभी कुछ रूप अपेक्षाकृत ब्रम्ह
की उपस्थिति को अधिक सक्षमता से निरूपित करते हैं यथा ज़ड पदार्थों की अपेक्षा जीव
रूप, जीवन की अपेक्षा विवेक, साधारण जनसमुदाय की अपेक्षा संत, ब्रम्ह की उपस्थिति को अधिक सक्षमता से
प्रगट करने वाले होते हैं ।
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