प्रत्येक रूप ब्रम्ह की प्रकृति का
सृजन है । ब्रम्ह प्रकृति दो भागो में विभक्त की जाती है । निम्नतर प्रकृति पराधीन, रूपधारी, गुणयुक्त होती है जबकि उच्चतर प्रकृति स्वतंत्र, अरूपधारी, अक्षर होती है । यह उच्चतर प्रकृति रूपधारी प्रकृति के गुणों के
अध्यास के फल से अपनी ब्रम्ह स्वरूप को कलंकित कर लेती है । इसी विस्मृत चेतना को
जागृत करना तथा जागृत रखना धर्म दर्शन का प्रधान लक्ष्य होता है ।
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