भगवद्गीता
बुधवार, 5 अक्टूबर 2016
हृदय में वासी
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले हे गुणाकेश
(
अर्जुन
)
मैं प्रत्येक जीव के हृदय में वास करता हूँ । मैं ही इस रूप संसार में व्याप्त समता का प्रारम्भ हूँ. मैं ही इस समता का अंतिम अंत भी हूँ ।
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