सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

आशिर्वचन की व्याख्या

गुरू का उपदेश है कि ब्रम्ह के विस्तार का अंत नहीं है, फिरभी अध्ययन काल में ब्रम्ह की अभिव्यक्ति तुलनात्मकरूप से कुछ रूपों में अधिक विदित दीखने वाली होती है । इसलिये गुरू ने जिज्ञासु को प्राम्भिक काल में ध्यान के लिये कुछ मुख्य मुख्य रूपो को बताने के लिये कहा है । इस स्थल पर स्मरणीय है कि जिज्ञासु अर्जुन ने यही जिज्ञासा व्यक्त की थी कि मैं ध्यान करने के समय किस रूप का ध्यान कर ब्रम्ह में मस्तिष्क को ध्यान काल में केंद्रित करूँ । 

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