गुरू का उपदेश
स्वभाव और आत्मानुभूति दोनों को एकाग्र करके परमात्मा की शरण ग्रहण करने के लिये
निर्देश करता है । स्वभाव जो कि पूर्व के कर्मों से सृजित है और आत्मानुभूति जो कि
सर्वोच्च ज्ञान का द्योतक है, इन दोनो को उस परमात्मा को अर्पित कर दो । यह अहंकार के पूर्ण समर्पण का
व्यवहारिक स्वरूप है ।
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