मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

समस्त का मूल

सभी जीवों का अधार ईश्वर स्वयं है । प्रकृति निर्मित शरीर कर्मफलों के भोग के लिये निर्मित है । यह कर्मफल न्याय पर आधारित हैं । सृजन के विज्ञान के फल से व्यक्ति अपने आधार ईश्वर से अनभिज्ञ है । इस अनभिज्ञता के कारण ही वह सन्सारी है परिच्छिन्न है । इस परिच्छिन्नता की पूर्ति के लिये वह कर्म करता है । यह समस्त चक्र अनायास नहीं है । प्रश्न है कि व्यक्ति यदि इन तथ्यों को ग्राह्य बना सके । 

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