व्यक्ति मुक्ति
अथवा संसारी-त्रास भोग में से
किसी एक का चुनाव करने को स्वतंत्र है । यदि मोंह-वश व्यक्ति ऐसा सोचता है
कि वह ब्रम्ह की शक्ति के विरुद्ध कार्य कर सकता है तो निश्चय ही उसे सांसारिक-त्रास भोग झेलने
ही होंगे । परमात्मा की अवज्ञा अहंकार के कारण होती है ।
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