अज्ञान का निवारण
व्यक्ति का प्रथम लक्ष्य होना चाहिये । प्रत्येक जीव का सृजन किसी ईश्वरीय प्रयोजन
की पूर्ति के लिये हुआ है । जब तक व्यक्ति का अहंकार प्रधान रहता है तब तक व्यक्ति
अपनी इच्छाओं को प्रधान मानता है । परंतु ईश्वर के नियम-विधान का कोई उलन्घन नहीं
कर सकता है । ईश्वर के विधान को स्वीकारना और अहंकार का क्षय एक सत्य को दो प्रकार
से व्यक्त करना है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें