जैसा कि गुरू ने
उपदेश किया कि व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुकूल कार्यों को करना चाहिये । स्वभाव
जो कि पूर्व के कर्मों के अनुसार सृजित होता है । इसलिये यह प्रकृति के अनुदेशों
के अनुकूल कहा जायेगा । प्रकृति के अनुदेश न्यायपूर्ण होते हैं । भावनायें
व्यवहारिक प्रतिक्रियाओं से सृजित होती हैं । इसीलिये गुरू ने कहा कि यदि तुम अपनी
भावना के अनुरूप निर्णय करोगे तो तुम्हारी अपनी प्रकृति ही उसे स्थिर नहीं होने
देगी ।
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