व्यक्ति का स्वरूप
आत्मा है । आत्मा सदैव अकर्ता है । अज्ञान निवारण के फल से जब व्यक्ति अपने स्वरूप
के सत्य परिचय से भिज्ञ हो जाता है तो वह कार्य तो करेगा परंतु कृतत्व का भाव
अकर्ता का भाव हो जायेगा । कार्य का त्याग तो किसी भी व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं
हो सकता । जीवित रहते कार्य तो प्रत्येक को करना ही करना है । महत्वपूर्ण कृतत्व का
भाव है जो कि पूर्णता और बंधन में पर्णित होता है ।
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