गुरू के उपदेश के
अनुसार, जैसा कि तेरहवें
अध्याय में था, समस्त कर्मों की
कर्ता प्रकृति है, ब्रम्हस्वरूप आत्मा सदैव अकर्ता है । व्यक्ति का स्वभाव उसके
पूर्व के कर्मों के अनुरूप होता है । सृष्टि का संचालन कर्म और कर्मफल के सिद्धांत
पर प्रकृति द्वारा संचालित हो रहा है । प्रकृति न्याय पर आधारित है । न्यायविरूद्ध
कृत पाप है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें