गुरु के उपदेश में
उपासना के माध्यम के रूप में कर्म दायित्व का सम्पादन बताने का आधार व्यक्ति के
स्वभाव से सम्बंधित है । स्वभाव का मूल उस व्यक्ति के पूर्व के जन्मों के आधार पर
सृजित हुआ होता है । इस प्रकार यदि व्यक्ति प्रकृति के संविधान के तदात्म्य में
अपने को प्रस्तुत करता है तो निश्चय ही वह पूर्णता के लिये योग्य पात्र है ।
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