भगवद्गीता में
इच्छा से मुक्त कर्म की अनुशंसा गुरू प्रारम्भ से ही करते आये हैं । इच्छापूर्ति
परिच्छिन्नता की अनुभूति से सृजित होती है । परिच्छिन्नता अध्यास है । यह सत्य
स्वरूप के प्रति अनिभिज्ञता है । आत्मा सदैव अकर्ता है । इसीलिये इच्छा से मुक्त
कर्म पूर्णता की उपलब्धि में पर्णित होगा ।
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