गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण बोले हे कुंती के पुत्र (अर्जुन), व्यक्ति को अपनी प्रकृति
के अनुकूल कार्य का परित्याग नहीं करना चाहिये, कंचिद वह कार्य दोष से
आच्छादित ही क्यों न हो क्योंकि प्रत्येक उद्यम दोष से आच्छादित होता है जैसे कि
धुँआ से अग्नि आच्छादित होती है ।
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