सन्यास और त्याग
के सम्बंध में गुरू के उपदेश का सार यह है कि व्यक्ति को व्यवहारिक जीवन में कर्म
के करने न करने के प्रकरण में इतने चुनाव के विकल्प तो उपलब्ध रहते नहीं है, इसलिये मर्यादित आचरण
यह है कि ज्ञान को धारण किये हुये और अधिष्ठान ब्रम्ह को सर्वोपरि सत्ता के रूप
में समर्पित रहते हुये समस्त कर्मों को करे, यही निर्वाण का पथ है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें