आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में पूर्णतया प्रकृति से अछूती रहती है
। परंतु प्रकृति के मध्य रहते, प्रकृति के गुणो का भोग करते वह
मोंह आसक्ति जनित कर लेती है । यत्न द्वारा आत्मा को आच्छादित मोंह से मुक्त करना
तथा इसे अपने मौलिक स्वरूप में पुनर्स्थापित करना मर्यादा की स्थापना है । योग खोई
हुई मर्यादा की पुनर्स्थापना है ।
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